Anathanchi Mai Sindhutai by (Sanjay Patil)

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“सिंधुताई को बचपन से ही पढ़ाई में बहुत रूचि थी मगर माँ पढ़ाई के सख्त खिलाफ थी | बचपन से ही सिंधु अपने पिताजी की लाड़ली बेटी थी और ज्यादातर समय इन्ही के साथ बिताया करती थी | एक प्रकार से कहा जा सकता हैं कि माँ अपनी बेटी से बहुत नफरत किया करती थी क्योंकि माँ बेटी नहीं अपितु एक बेटा चाहती थी | शायद ये मेरे भारतदेश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य हैं कि अधिकतर लोग तो बस बेटों की ही चाहत रखते हैं, कुछ लोग तो बेटी को अपनाना भी नहीं चाहते हैं जिसका सबसे बड़ा परिणाम हैं कि कन्या भ्रूणहत्या काफ़ी अधिक मात्रा में किया जा रहा हैं | मानव समाज में इससे बड़ा पाप कोई और हो ही नहीं सकता | माँ का ये कहना था कि बड़ी होकर तो अपने ससुराल जाकर रसोईघर ही संभालना हैं तो फिर पढ़ाई करने की क्या जरुरत हैं? इससे बढ़िया तो घर की भैंस चराने जायेगी तो कम से कम दूध बेचकर घर की आर्थिक स्तिथि में तो सुधार होंगा | माँ का ये मानना था कि पढ़ाई करने से बेवजह ही समय और पैसे दोनों का ही नुकसान हुआ करता हैं | फिर भी सिंधुताई भैंस को नदी में छोड़कर फिर माँ को बिना बताये स्कूल पढ़ने जाया करती हैं | सचमुच शिक्षा में वो ताकत है यदि किसी को इसकी आदत लग जाये तो फिर पढ़ने के लिये कोई ना कोई रास्ता निकाल ही लिया करते हैं | सिंधु ने चौथी कक्षा पास कर ली थी, घर की आर्थिक स्तिथि और पुरानी रूढ़िवादिता की वजह से माँ ने सिंधु का 12 वर्ष की उम्र में ही विवाह कर दिया था, वो भी उनकी उम्र से 20 साल बड़े व्यक्ति से | हमारे देश में बालविवाह भी कुप्रथा ही हैं क्योंकि इस अवस्था में लड़की शारीरिक व मानसिक दोनों ही रूप से विवाह योग्य नहीं हो पाती हैं और ये हमारे देश के पतन होने का सबसे बड़े कारणों में से एक हैं | जिस उम्र में बच्चे चाहे वो लड़का हो या लड़की पढ़ाई करके आगे बढ़ने का सपना पूरा करना चाहते हैं, उन्ही की कम उम्र में शादी करने से हम कही ना कही उनके विकास में बाधक बन जाते हैं | जब सभी लोगो का विकास होंगा तभी तो समुचित भारत देश का भी तो विकास होंगा | जब सिंधताई को बेटी हुई तो उनके पति ने उन्हें घर से निकाल दिया, वो जैसे-तैसे अपने माँ के घर गई तो उनकी माँ ने कहा, तुझे तेरे पति ने घर से निकाला हैं और अभी समाज में तेरे बारे में बहुत सी गलत अफवाहे भी चल रही हैं | यदि तुम मेरे घर रहोगी तो मुझे समाज गाँव से बाहर निकाल देगा | अब तु चाहे गाड़ी के नीचे आकर मर जा, या नदी में कूद जा या शमशान घाट चली जा, इससे मुझे कोई मतलब नहीं हैं | सिंधु माँ की इन बातो को सुनकर अंतर्मन से पूरी तरह से टूट चुकी थी, यहाँ तक कि उन्होंने ट्रैन की पटरी पर आत्महत्या करने की भी सोची मगर अपनी 6 महीने की बेटी के मासूम से चेहरे देखकर जीवन जीने की एक छोटी सी उम्मीद जगाई अपने मन में | उन्होंने शमशान घाट में जहाँ मुर्दो को जलाया जाता हैं, उसी आग में रोटी बनाकर खाई थी सचमुच ये भूख कितनी ख़तरनाक होती है जो इंसान को कुछ भी करने पर मजबूर कर दिया करती हैं | अब सिंधु ट्रैन में गाना गाकर जो भी पैसे मिलते थे, उसमें वो खुद भी खाना खाती थी और प्लेटफार्म पर बैठे बहुत से भूखे बच्चों को भी खाना खिलाया करती थी | इस तरह सिंधुताई ने अपने जीवन में बहुत से कष्ट सहन करके संघर्ष किया और हमारे देश की सबसे बड़ी समाजसेविका बनी | उनके भाषण बहुत ही ज्यादा प्रभावशाली हैं, साथ ही 1000 से भी ज्यादा अनाथ बच्चों की पालन पोषण करने वाली हैं तभी तो उन्हें कहा जाता हैं अनाथांची माय सिंधुताई |
मै सच्चे मन से सिंधुताई के इस संघर्ष को नमन करता हूँ और ये हमारे लिये सबसे बड़े गर्व की बात हैं कि सिंधुताई का जन्म हमारे भारत देश में हुआ | मेरी तरफ से ये किताब के रूप में अनाथांची माय सिंधुताई को सच्चे दिल से श्रद्धांजली हैं और भगवान से मै बस यही प्रार्थना करता हूँ कि फिर सिंधुताई का पुनर्जन्म हो क्योंकि हमारे भारतदेश के सकारात्मक दिशा में विकास के लिये सिंधुताई जैसे महान व्यक्तित्व की बहुत जरूरत हैं |

  • Publisher ‏ : ‎ Booksclinic Publishing (15 September 2022)
  • Language ‏ : ‎ Hindi
  • Paperback ‏ : ‎ 99 pages
  • ISBN-13 ‏ : ‎ 9789355353238
  • Reading age ‏ : ‎ 3 years and up
  • Country of Origin ‏ : ‎ India
  • Generic Name ‏ : ‎ Book

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Description

मेरा जन्म 9 मार्च 1992 को गाँव बिरूल बाजार, जिला बैतूल, मध्यप्रदेश मे हुआ था | जब मै 5 वर्ष का था तब मेरी मम्मी का स्वर्गवास हो गया था | इस घटना का मानसिक रूप से मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ा | मेरा बचपन, अन्य बच्चों की तरह खेलकूद, शरारत मे नहीं बीत पाया, मुझे ज्यादातर एकांत मे ही रहना अच्छा लगता था | इस एकांत मे अक्सर अपनी सोचविचार मे ही डूबा रहता था | मैंने 12 वर्ष की उम्र से ही अपनी सोच और भावनाओं को डायरी मे लिखना प्रारम्भ किया | एक दिन की बात है, तवानगर के हॉस्टल मे,जब मै 7 वी कक्षा मे पढ़ता था, तब मेरे शिक्षक भार्गव सर ने गलती से मेरी डायरी के कुछ पन्ने पढ़े,वो काफ़ी प्रभावित हुए तब से सर मुझे हमेशा लिखने के लिए प्रेरित करते रहते थे | अक्सर एकांत में प्राकृतिक दृश्य और डायरी मेरे सबसे अच्छे दोस्त बन गये थे | तवानगर हॉस्टल मे भार्गव सर और मालवीय मैडम ये वो दो शिक्षक है, जिनका मेरे जीवन मे बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है | भार्गव सर ने जहाँ लिखने के लिए प्रेरित किया, वही मालवीय मैडम ने मेडिटेशन करके अंतर्मन को प्रबल और साइकोलॉजी की छोटी छोटी बातो को सिखाया | ये शिक्षाएं मुझे जीवन के हर कठिन दौर मे भी शांत होकर सूझबूझ से निर्णय लेने मे मदद किया करती है | बचपन से ही रवीन्द्रनाथ टैगोर जी और प्रेमचंद जी मेरे लिए आदर्श रहे है और उनकी रचनाओ से काफ़ी ज्यादा प्रभावित भी हुआ था | मैंने बहुत सी रचनाएँ लिखी है जिसमे “संघर्ष”, “जिन्दा लाश”, “माँ की ममता”, “तवानगर हॉस्टल”,” “भाई”, “अभिशापित जीवन”,”जिम्मेदारी”, “प्यार”, “निःसंतान”, “परिवार”,”वोल्टास (टाटा ग्रुप )”,”चंबल घाटी” “मेरा भारत महान “,ट्रैन का सफर, कॉलेज का प्यार,छोटा सा आशियाना,प्राइवेट जॉब तलाक,इंतज़ार,जोखिम जैसी कुछ रचनाएँ है | मेरी कहानी “सपने”, “इंजीनियरिंग कॉलेज-1”, “अधूरी चाह-1” विद्रोह, कोरोना की लहर, सच्ची मोहब्बत,किसान आंदोलन, विजय, अनाथांची माय सिंधुताई प्रकाशित हुई है, बाकि कहानियाँ भी जल्द ही प्रकाशित करने की कोशिश करूँगा |

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Dimensions 5 × 8 cm

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