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Ehsaas-e-Farz-o-Fikr

उन दिलदार हस्तियों का दिल से षुक्रगुज़ार हूं, जिन्होंने मुझ नाचीज़ की तारीफ़बंदी में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि किताब देवनागरी लिपि पर मबनी उर्दू अल्फाज़ों की नुमांइदगी करती है, फिर भी चंद सफ़हा पर कुछ तबदीलियों के लिए माफी चाहता हूं। बेषक षायरी के भी कुछ तौर-तरीके होते हैं। लेकिन मेरे अष‘आर मुमक़िन है बेतरतीब हों और षायरी के पैमाने की मुख़ालफ़त करने वाले हों। इसलिए षायरी के सरताज़ों से गुज़ारिष करता हूं कि मुझे दिमाग़ से नहीं दिल से परख़ने की ज़हमत गवारा करें,

  • Paperback: 92 Pages
  • Publisher: Booksclinic Publishing
  • Language: Hindi Urdu
  • Edition: 1
  • ISBN: 9789388797023
  • Release Date: 10 February 2018

129.00 99.00

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SKU: book131BCP Category:

Book Details

Dimensions 5 × 8 cm

About The Author

Kewal Krishan Pangotra

मेरा जन्म जम्मू-कष्मीर में जिला कठुआ, तहसील हीरानगर के देहाती इलाके कट्टल ब्राहम्णा में एक ख़ालिस किसान ख़ानदान में 19 जनवरी 1962 को हुआ। यह इलाका पाकिस्तान की तहसील षकरगढ़ से लगता है और हमारी हीरानगर तहसील को उस वक़्त जसमेरगढ़ कहा जाता था। जम्मू-पठानकोट क़ौमी षाहरा के दरमियान कस्बा घगवाल के षुमाल में आज़ भी कोटला जंगल है। यहां पर कोटला नाम की बादषाहत के ज़माने में मेरे किसी पुरखे को कोटला षहर के जनूबी जानिब एक बड़ी जागीर हासिल हुई थी। उसी बुनियाद पर मेरे पुरखों को कोटले के ब्राहम्ण कहा जाने लगा, जो वक़्त के साथ कट्टल ब्राहम्णा में बदल गया। पुराणों पर मबनी बातों के हिसाब से कौटलया, जो बाद में कोटला कहलाया, मद्रदेष की राजधानी थी। बताया जाता है कि इसी मद्रदेष के राजा षल्य ने महाभारत की जंग में कौरवों की मदद की थी। चीनी सयाह हयूनसांग, जो कि 630 ई. में भारत आया, ने भी कोटला का ज़िक्र किया है। इस बात का ज़िक्र मैंने मुकामी तवारीख़ पर मबनी एक खोजी मज़मून ‘दि हिमालियन रीज़न्‘ में किया था, जो एक अंग्रेज़ी अखबार ‘अर्लि टाइम्स‘ में 05 मार्च 2010 को छाया हुआ। इस मज़मून के छाया होने के बाद मुकामी लोगों को मेरे गांव की तवारीख़ की जानकारी मिली। जाहिर है कि मेरे पुरखे कर्मकांडी ब्राहम्ण नहीं थे बल्कि षुरु से ही धरती पुत्र यानि किसान थे। यह दीगर है कि मौजूदा दौर में कुनबे के कई लोग कर्मकांड को बतौर पेषा अख़तियार किए हैं।

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